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लखनऊ, 25 अगस्त 2022 : भाजपा के जाट नेता भूपेंद्र सिंह के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही लोकसभा चुनाव 2024 के लिए बड़ी चुनौती है। दिल्ली में किसान आंदोलन के बीच भाजपा और जाटों के बीच पैदा हुई अविश्वास की दरार को उन्हें पाटना है तो राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) को रोकना और भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत को थामने का काम भी करना होगा।
सपा के साथ गठबंधन के बाद विधानसभा चुनाव में सपा को तो ज्यादा फायदा नहीं हुआ लेकिन रालोद को मजबूती मिली है। सपा के वोट रालोद के खाते में जाने और कुछ जाटों की नाराजगी के चलते विधानसभा चुनाव-2022 में जयंत सिंह चौधरी की पार्टी को आठ सीटें मिली थीं।
रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद गठबंधन संसदीय चुनाव में भी कायम रहने की संभावना है। विधानसभा चुनाव के समीकरण रहे तो लोकसभा चुनाव में रालोद कुछ सीटें हासिल कर सकता है। यह सीधे तौर पर भाजपा का ही नुकसान होगा। भूपेंद्र सिंह के जाट होने की वजह से वह जाटलैंड में पहले से ही असर रखते हैं।
भाजपा रणनीतिकारों की सोच है कि उनके अध्यक्ष बनने के बाद अब जाटों में सकारात्मक संदेश जाएगा। ऐसे में रालोद के प्रभाव को रोकने में वह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, वहीं दिल्ली सीमा पर एक साल तक आंदोलन में अग्रणी रही भाकियू की फिर आंदोलन से जाटों को अलग रख सकते हैं। लखीमपुर का महाप़ड़ाव इसकी शुरुआत मानी जा रही है। हालांकि भूपेंद्र सिंह को इसके लिए बहुत सक्रियता दिखानी होगी।
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